संथारत्थो खवओ जइया खीणो हवेज्ज तो तइया ।
वोसरिदव्वो पुव्वविधिणेव सोपाणगाहारो॥1501॥
संस्तर पर आरूढ़ क्षपक यदि हो जाए अति क्षीण अहो ।
तब उसको पूर्वाेक्त विधि से पानक-प्रत्याख्यान करो॥1501॥
अन्वयार्थ : और जिस समय संस्तर में स्थित क्षपक का शरीर क्षीण हो जाये तो पहले जो तीन प्रकार के आहार त्याग की विधि कही है, उसीप्रकार पानक/पीने योग्य आहार भी त्यागने योग्य है ।

  सदासुखदासजी