
एवं संथार गदस्स तस्स कम्मोदएण खवयस्स ।
अंगे कच्छइ उठ्ठिज्ज वेयणा ज्साणविधग्घयरी॥1502॥
संस्तर पर आरूढ़ क्षपक को पूर्वबद्ध कर्माेदय से ।
किसी अंग में ध्यान-विघ्नकारी पीड़ा यदि हो जाये॥1502॥
अन्वयार्थ : ऐसे संस्तर में स्थित क्षपक को कर्मोदय से कोई अंग में, ध्यान में विघ्न करने वाली वेदना उत्पन्न हो जाये तो क्या करना? वही कहते हैं -
सदासुखदासजी