पं-सदासुखदासजी
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वाली वेदना उत्पन्न हो जाये तो क्या करना? वही कहते हैं -
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बहुगुणसहस्सभरिया जदि णावा जम्मसायरे भीमे ।
भिज्जदि हु रयणभरिया णावा व समुद्दमज्झम्मि॥1503॥
ज्यों समुद्र के बीच रत्न से भरी नाव डूबने लगे ।
गुण-सहस्र से भरी यति-नौका भव-सागर में डूबे॥1503॥
सदासुखदासजी