
गुणभरिदं जदि णावैं दट्ठूण भवोदधिम्मि भिज्जंतं ।
कुणमाणो हु उवेक्खं को अण्णो हुज्ज णिद्धम्मो॥1504॥
यदि गुण से भरपूर नाव जो भव-समुद्र में डूब रही ।
कोई करे उपेक्षा उसकी अन्य अधार्मिक कौन सही॥1504॥
अन्वयार्थ : कर्मोदय से क्षपक की देह में, ध्यान में विघ्नकारक वेदना उत्पन्न हो जाये तो जैसे समुद्र के मध्य रत्नों से भरी नाव टूट जाये, तैसे ही अनेक गुणरत्नों से भरी साधुरूपी नौका भयानक संसार-समुद्र में टूट जाती है । इसलिए धर्मात्मा साधुजन जैसे क्षपक की वेदना शान्त हो, तैसे उपदेशादि प्रतीकार करें और वेदना घटकर परिणाम समतारूप व्रतों में सावधान हों, तैसी वैयावृत्यादि करें । और यदि गुणों से भरी साधुरूपी नाव वेदनादि से संसार-समुद्र में टूटती देखकर जो रक्षा का उपाय उपदेश वैयावृत्यादि नहीं करते हैं, उदासीन रहते हैं तो उसके समान दूसरा कौन धर्मरहित अधर्मी होगा? जो गुणों से सहित साधु का धर्म बिगडता देखकर अपनी शक्तिप्रमाण भी रक्षा नहीं करते, वे तो धर्म से पराङ्मुख होकर स्वयं का धर्म ही बिगाडते हैं ।
सदासुखदासजी