वेज्जावच्चस्स गुणा जे पुव्वं विच्छरेण अक्खादा ।
तेसिं फिडिओ सो होइ जो उवेक्खेज्ज तं खवयं॥1505॥
पहले जो वैयावृत के विस्तार पूर्वक गुण भाषे ।
करे उपेक्षा जो मुनिवर की वह उन सबसे च्युत होवे॥1505॥
अन्वयार्थ : जो साधु धर्म का मार्ग जान करके भी अन्य मुनीश्वर वेदना से चलायमान हो रहे हों, उन्हें धर्मोपदेश देकर, शरीर की टहल करके स्थिर नहीं करते तथा संयमी के योग्य और भी इलाज से वैयावृत्त्य नहीं करते, वे क्षपक मात्र से ही उदासीन रहते हैं । वे साधु पूर्व में जो वैयावृत्त्य के गुण विस्तार पूर्वक कहे गये हैं, उन गुणों से रहित होते हैं ।

  सदासुखदासजी