णाऊण विकारं वेदणाए तिस्से करेज्ज पडियारं ।
फासुगददव्वेहिं करेज्ज वायकफपित्तपडिघादं॥1507॥
भली भाँति जानें निर्यापक क्षपक-वेदना और विकार ।
वात-पित्त कफ अवरोधक प्रासुक द्रव्यों से कर परिहार॥1507॥
अन्वयार्थ : क्षपक के रोगादि जानकर, उस रोग की वेदना का इलाज साधु के योग्य प्रासुक द्रव्यों से करना और वात, पित्त, कफ का नाश भी प्रासुक द्रव्यों से करना चाहिए ।

  सदासुखदासजी