बच्छीहिं अवद्दवणतावणेहिं आलेवसीद किरियाहिं ।
अब्भंगणपरिमद्दण आदीहिं तिगिंछद खवयं॥1508॥
वस्तिकर्म1 अरु उष्णकरण मर्दन लेपन या शेक करें ।
मालिश अथवा अंग-दमन से क्षपक वेदना दूर करें॥1508॥
अन्वयार्थ : और वस्तिकर्म (एनिमा) जो मलद्वार में बत्ती इत्यादि से करते हैं, अग्नि से सेंकना, तपाना, औषधि का लेप करना, शरीर में ठंडक-शीतक्रिया करना, मालिश, अंग को दबाना, मसलना, इत्यादि प्रासुक द्रव्यों से संघ में स्थित मुनि तथा धर्मात्मा श्रावकादि क्षपक का इलाज करें; क्योंकि व्रती धर्मात्मा को वेदना से पीडित देखकर उनकी जो उपेक्षा करता है, वह अधर्मी है । जैसे बने, तैसे उनके धर्म की रक्षा ही करनी चाहिए । यदि धर्मात्मा व्रतियों के अंतिम समय में तीव्रकर्म के उदय से रोग-वेदनादि प्रबल आताप हो जाये, उससे शिथिल हो जायें और चलायमान हो/अयोग्य आचरण करने के लिये भी तैयार हो जायेें तो उस समय धैर्यवान होकर स्थितिकरण ही करना चाहिए और भी अनेक उपायों से दु:ख दूर करना ही चाहिए । दु:ख आने पर साधर्मी को छोड दे, वे तो महानिर्दयी हैं, धर्म से पराङ्मुख है और धर्म की निंदा कराने वाले हैं । उनका समाधिमरण नहीं होगा और आगे भी समाधिमरण करने में अन्य सभी मुनि शिथिल हो जायेंगे ।

  सदासुखदासजी