एवं पि कीरमाणो परियम्मे वेदणा उवसमो सो ।
खवयस्स पावकम्मोदएण तिव्वेण हु ण होज्ज॥1509॥
इसप्रकार प्रतिकार करें यदि तो भी पापोदय से तीव्र ।
शान्त न होवे क्षपक-वेदना क्योंकि कर्म-फल है निश्चित॥1509॥

  सदासुखदासजी