अहवा तण्हादिपरीसहेहिं खवओ होज्ज अभिभूदो ।
उवसग्गेहिंब खवओ अचदेणो हविज्ज अभिभूदो॥1510॥
अथवा क्षुधा-तृषादिक की हो तीव्र वेदना से अभिभूत ।
अथवा उपसगाब से पीड़ित होकर वह होवे मूर्च्छित॥1510॥

  सदासुखदासजी