तो वेदणावसट्ठो वाउलिदो वा परीसहादीहिं ।
खवओ अणप्पवसिओ सो विप्पलवेज्ज जं किं पि॥1511॥
पीड़ित हुआ वेदना से उपसर्ग परीषह से व्याकुल ।
हुआ क्षपक यदि रहे न निज वश और कहे निःसार वचन॥1511॥

  सदासुखदासजी