
सदिमलभंतस्स वि का दव्वं पडिकम्ममठ्ठियं गणिणा ।
उवदेसो वि सया से अणुलोमो होदि कायव्वो॥1518॥
जिसको स्मृति नहीं हुई उसका भी करें गणी प्रतिकार ।
उसके जो अनुकूल वचन हो कहे निरन्तर श्री आचार्य॥1518॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार आचार्य, क्षपक को अपना मुनिपना, आराधना-पूर्वक मरण की प्रतिज्ञा तथा चार प्रकार के आहार त्याग की यादगिरी/स्मरण कराते हैं । और यदि साधु की स्मरण कराने पर भी स्मृति को प्राप्त नहीं होता, अपने त्याग में, संयम में चेतना को प्राप्त/ सावधान नहीं होता है तो गणी आचार्य शिथिलतारहित होकर क्षपक का स्मरण दृढ हो, ऐसा प्रतीकार/उपाय करते हैं ।
सदासुखदासजी