पं-सदासुखदासजी
चेयंतोऽपि य कम्मोदयेण कोई परीसहपरद्धो ।
उभ्भासेज्ज वउक्कावेज्ज व भिंदेज्ज व पदिण्णं॥1519॥
क्षपक अचेतन होकरभी कर्माेदय वश परिषह अधीन ।
रुदन करे या अनुचित बोले और प्रतिज्ञा भंग करें॥1519॥
सदासुखदासजी