ण हु सो कडुवं फरुसं व भाणिदव्वो ण खीसिदव्वो य ।
ण य वित्तासेदव्वो ण य वट्ठदि हीलणं कादंु॥1520॥
कटुक वचन नहिं कहें तथा नहिं करें क्षपक का तिरस्कार ।
त्रास न देवें हास्य करें नहिं अथवा नहीं करें अपमान॥1520॥
अन्वयार्थ : कोई क्षपक सावधान तो है, किन्तु कर्मोदय के कारण परीषहों से पीडित होकर कुछ अयोग्य वचन बोले, रुदन करने लगे तथा आतुर-पीडित होकर अपना व्रतप्रतिज्ञा भंग करे तो उस साधु को कटुक वचन कहना योग्य नहीं है । उसका तिरस्कार भी नहीं करना, हास्य करने योग्य भी नहीं है । त्रास/दु:ख देने योग्य नहीं तथा पराभव/ छोड देने योग्य भी नहीं है ।

  सदासुखदासजी