फरुसवयणादिगेहिं दु माणी विप्फुरिसिदो तगो संतो ।
उद्धाणमवक्कमणं कुज्जा असमाधिकरणं च॥1521॥
कटु वचनों से वह अभिमानी क्षपक छोड़ दे संयम को ।
आर्त्त रौद्र दुर्ध्यान करे या तजना चाहे समकित को॥1521॥
अन्वयार्थ : कठोर वचनादि नहीं कहने चाहिए ।

  सदासुखदासजी