
णिद्धं मधुरं पल्हादणिज्ज हिदयंगमं अतुरिदं वा ।
तो सीहावेदव्वो सो खवओ पण्णवंतेण॥1523॥
स्नेहासिक्त कर्णप्रिय चित को सुखदायक अरु मधुर वचन ।
हृदय-प्रवेशी वचन कहें धीरे-धीरे आचार्य प्रवर॥1523॥
अन्वयार्थ : महान बुद्धिमान गुरु के द्वारा क्षपक को शिक्षारूप वचन कहने योग्य हैं । कैसे वचन कहते हैं? स्नेह सहित कहते हैं, कर्ण को प्रिय लगें, ऐसे कहते हैं और आनंद करने वाले वचन कहते हैं, जिन्हें सुनते ही सभी दु:खों का विस्मरण हो जाये तथा हृदय में प्रवेश कर जायें, ऐसे ग्राह्य वचन कहते हैं । अति शीघ्रतापूर्वक भी वचन नहीं कहते ।
सदासुखदासजी