पं-सदासुखदासजी
रोगादंके सुविहिद विउलं वा वेदण धिदिवलेण ।
तमदीणमसंमूढो जिण पच्चूहे चरित्तस्स॥1524॥
रोगजन्य लघ-ु विपुल व्याधियों की पीड़ा को धृतिबल से ।
हे चारित धारक साधु तुम जीतो दीन रहित होकर॥1524॥
सदासुखदासजी