
सव्वे उवसग्गे परिसहे य तिविहेण णिज्जिणहितुमं ।
णिज्जिणिय सम्ममेदे होहिसु आराहओ मरणं॥1525॥
सभी परीषह उपसगाब को जीतो तुम मन-वच-तन से ।
इन्हें जीतकर सम्यक् विधि से आराधना समाधि हो॥1525॥
अन्वयार्थ : हे सुन्दर चारित्र के धारक मुने! तुम दीनतारहित तथा मोहरहित होकर धैर्य के बल से चारित्र में विघ्न करने वाले रोग/महान व्याधि और आतंक/छोटी व्याधि, उनकी प्रबल वेदना को जीतो तथा समस्त उपसर्ग को, परीषहों को मन, वचन, काय से जीतो । रोग-वेदना-उपसर्ग-परीषहों को जीतकर मरण समय में सम्यक्प्रकार से चार आराधनाओं का आराधन करो ।
सदासुखदासजी