
संभर सुविहिय जं ते मज्झम्मि चदुव्विहस्स संघस्स ।
वूढा महापदिण्णा अहयं आराहइस्सामि॥1526॥
आराधना करूँगा मैं - जो एेसी महा-प्रतिज्ञा की ।
चउविध संघ समक्ष क्षपक तुमने ! अब उसको याद करो॥1526॥
अन्वयार्थ : हे चारित्र धारक! चार प्रकार के संघ के मध्य तुमने महा प्रतिज्ञा धारण की थी कि "मैं आराधना धारण करूँगा" उसका तुम स्मरण करो, याद करो! भूल गये क्या?
सदासुखदासजी