थोलाइदूण पुव्वं माणी संतो परीसहादीहिं ।
आवडिदमित्तओ चेव को विसण्णो हवे साहू॥1528॥
इसीतरह हो दृढ़ प्रतिज्ञ पर कौन स्वाभिमानी साधु ।
परिषह सन्मुख आने पर जो खेद खिन्न परिणामी हो॥1528॥
अन्वयार्थ : तैसे ही जो मुनिधर्म का मानी होकरऔर सर्वसंघ में भुजाओं का आस्फालन करके प्रतिज्ञा करता है कि "मैं चार आराधनाओं को धारण करूँगा" फिर परीषह वैरी के आगमन मात्र से कौन चलायमान होगा? कौन विषादी होगा? उत्तम साधु तो प्रतिज्ञा करके कदापि भी चलायमान होकर विषाद नहीं करेगा ।

  सदासुखदासजी