आवडिया पडिकूला पुरओ चेवक्कमंति रणभूमिं ।
अवि य मरिज्ज रणो ते ण य पसरमरीण वढ्ढंति॥1529॥
रण भूमि में शत्रु आए इससे पहले ही जो पहुँचे ।
मरना करें पसन्द परन्तु शत्रु को नहिं बढ़ने दें॥1529॥

  सदासुखदासजी