
तह आवडिदप्पडिकूलदाए साहू विमाणिणो सूरा ।
अइतिव्ववेय णाओ सहंति ण य विगडिभुवयांति॥1530॥
इसी तरह प्रतिकूल परिस्थिति हो पर शूरवीर साधु ।
तीव्र वेदना सहकर भी वे कभी न विचलित हों पथ से॥1530॥
अन्वयार्थ : जैसे शूरवीरपने का अभिमानी पुरुष बैरियों को अपने सन्मुख आया देखकर रणभूमि में आगे ही जाता है - बैरियों के सन्मुख/सामने ही जाता है और रणभूमि में प्राण नष्ट हो जायें, परन्तु जीवित रहने तक रणभूमि में वैरी का प्रसर नहीं बढने देता/शत्रु के आधीन नहीं होता । तैसे ही मानी और शूरवीर साधु आपदा के प्रतिकूल होकर अति घोर वेदना को समभावों से सहते हैं, परिणामों में विकार भाव को प्राप्त नहीं होते हैं ।
सदासुखदासजी