थोलाइयस्स कुलजस्स मणिणो रणमुहे वरं मरणं ।
ण य लज्जणयं काउं जावज्जजीवं सुजणमज्झं॥1531॥
भुज फड़काने वाले अभिमानी भट को है मरना श्रेष्ठ ।
किन्तु स्वजन के बीच सदा लज्जित होकर नहिं जीना श्रेष्ठ॥1531॥
अन्वयार्थ : किया है भुजाओं का आस्फालन अर्थात् ढकोरना जिसने, ऐसे उच्च कुल में उत्पन्न मानी को रण में मरण करना श्रेष्ठ है, परंतु यावज्जीवन स्वजनों के बीच लज्जा जनक कार्य करके जीना श्रेष्ठ नहीं है ।

  सदासुखदासजी