
समणस्स माणिणो संजदस्स णिहणगमणं पि होइ वरं ।
ण य लज्जणय कादुं कायर दादीणकिविणत्तं॥1532॥
इसीतरह संयमी श्रमण का मरण प्राप्त हो जाना श्रेष्ठ ।
दीन तथा कायर हो लज्जा-जनक कार्य करना नहिं श्रेष्ठ॥1532॥
अन्वयार्थ : श्रमण और मानी संयमी मुनि को मरण को प्राप्त होना श्रेष्ठ है, परन्तु लज्जा करने योग्य कायरपना, दीनपना, कृपणपना करना श्रेष्ठ नहीं अर्थात् इसने रत्नत्रय धर्म भंग किया है, ऐसा जनापवाद श्रेष्ठ नहीं ।
सदासुखदासजी