एयचस्स अप्पणो को जीविदहेदुं करिज्ज जपणयं ।
पुत्तपउत्तादीणं रण पलादो सजणलंछ॥1533॥
केवल इस जीवन की रक्षा हेतु युद्ध से भागे कौन?
पुत्र-पौत्र परिवार जनों को कौन लगाएगा लांछन॥1533॥

  सदासुखदासजी