तह अप्पणो कुलस्स य संघस्स य मा हु जीवदत्थं तं ।
कुणसु जणे जंपणयं किविणं कुव्वं सगणलंछं॥1534॥
इसीतरह इस जीवन हेतु न कर अपवाद स्वकुल-संघ का ।
अहो क्षपक! निर्बलता दिखलाकर न करो लांछन गण का॥1534॥
अन्वयार्थ : जिसप्रकार कुलीन योद्धा की मृत्यु होना श्रेष्ठ है, किन्तु युद्ध में शत्रुओं से घबडाकर भाग जाने से पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा में, अपने कुल को कौन कलंकित करेगा? अर्थात् कलंक लगाना श्रेष्ठ नहीं । तैसे ही हे क्षपक! तुम अपने जीवन के खातिर अधमपना - दीनपना मत करो, तुम अपने कुल और संघ का लोक में अपवाद मत कराओ! अपने संघ तथा धर्म को कलंक मत लगाओ ।

  सदासुखदासजी