
गाढप्पहारसंताविदा वि सूरा रणे अरिसमक्खं ।
ण मुहं भंजंति सयं मरंति भिउडीए सह चेव॥1535॥
युद्ध भूमि में यदि योद्धा पर शत्रू करते तीव्र प्रहार ।
तो भी वे मुख नहीं मोड़ते मरकर भी नहिं मानें हार॥1535॥
अन्वयार्थ : जैसे शूरवीर पुरुष संग्राम में शस्त्रों के दृढ प्रहार से पीडित होकर मर जाते हैं, किन्तु शत्रुओं के सामने भ्रकुटी भंग नहीं करते, उल्टा मुख नहीं करते अर्थात् शत्रु से डरकर भागते नहीं हैं ।
सदासुखदासजी