सुट्ठु वि आवइपत्ता ण कायरत्तं करिंति सप्पुरिसा ।
कत्तो पुण दीणत्तं किविणत्तं वा वि काहिंति॥1536॥
इसी तरह अति आपत्ति हों किन्तु न सज्जन हों कातर ।
क्यों दिखलायें दीन भाव अथवा वे क्यों होवें कायर॥1536॥
अन्वयार्थ : तैसे ही जो सत्पुरुष हैं, वे अत्यंत महान आपदा आ जाने पर भी कायरता नहीं करते तो वे दीनता - कृपणता कैसे करेंगे?

  सदासुखदासजी