कोई अग्गिमदिगदा समंतओ अग्गिणा वि डज्झंता ।
जलमज्झगदा व णरा अत्थांति अचेदणा चेव॥1537॥
ज्यों कोई नर जले अग्नि में धू-धू करके चारों ओर ।
किन्तु रहे वह पत्थर जैसा अथवा जैसे जल में हो॥1537॥

  सदासुखदासजी