
तत्थ वि साहुक्कारं सगअगुलिचालणेण कुव्वंति ।
केई करंति धीरा उक्किठ्ठिं अग्गिमज्झम्मि॥1538॥
अथवा कोई अग्नि बीच भी उंगली की चेष्टा द्वारा ।
अशुभ कर्म क्षय हुए धैर्य से वे निज आनन्द प्रकट करे॥1538॥
अन्वयार्थ : कितने ही धीर-वीर उत्तम पुरुष अग्नि के मध्य चारों ओर से अग्नि से जलते हुए भी वेदना रहित हो बैठ जाते हैं, मानो पानी के मध्य ही निराकुल हो, अचेतन समान बैठे होंऔर वे धीर पुरुष उस अग्नि के मध्य स्थित होकर भी अंगुलियों को चलाकर साधुकार करते हैं कि "अच्छा हुआ! कर्म का ऋण चुका" और कोई अग्नि के मध्य उत्क्रोशन/आनंद से विशिष्ट शब्द करते हैं या कहते हैं ।
सदासुखदासजी