जदिदा तह अण्णाणी संसार पवढ्ढणाय लेस्साए ।
तिव्वाए वेदणाए सुहसाउलया करिंति धिदिं॥1539॥
यदि संसार प्रवर्धक अशुभ लेश्या संयुत अज्ञानी ।
इन्द्रिय-सुख-तृष्णा से व्याकुल होने पर भी धैर्य धरें॥1539॥

  सदासुखदासजी