किं पुण जदिणा संसार सव्वदुक्खक्खयंं करंतेण ।
बहुतिव्वदुक्खरस जाणएण ण धिदी हवदि कुज्जा॥1540॥
तो फिर क्षपक साधु भी जो अब दुख का क्षय करना चाहें ।
चतुर्गति का दुःख जानें वे क्यों नहिं धारण धैर्य करें॥1540॥
अन्वयार्थ : यदि अज्ञानी जीव असह्य वेदना आने पर संसार बढाने वाली अशुभ लेश्या से युक्त होकर इन्द्रियजन्य सुख-स्वाद में लंपटी हो धैर्य को धारण करते हैं अर्थात् सांसारिक सुखों के लिये महान महान कष्टों को/वेदनाओं को बडे ही धीरता से सहते हैं तो फिर संसार का छेद करने में उद्यत हुए मुनि तपोधन क्या वेदना के आने पर धैर्य धारण नहीं करेंगे? अवश्य ही धैर्य धारण करेंगे ।

  सदासुखदासजी