असिवे दुभिक्खे वा कंतारे वा भए व आगाढे ।
रोगेहिं व अभिभूदा कुलजा माणं ण विजहंति॥1541॥
रोग मरी दुर्भिक्ष, भयानक वन में या प्रगाढ़ भय में ।
रोग ग्रस्त हों पर कुलीन नर स्वाभिमान निज नहिं तजें॥1541॥

  सदासुखदासजी