ण पियंति सुरं ण य खंति गोमयं ण य पलंडुमादीयं ।
ण य कुव्वंति विकम्मं तहेव अण्णंपि लज्जणयं॥1542॥
मदिरा-मांस न सेवें वे नर लहसुन प्याज नहीं खावें ।
नहीं दूसरों की जूठन लें या लज्जास्पद कार्य करें॥1542॥
अन्वयार्थ : मारी/प्लेग में, दुर्भिक्ष का काल पडने पर, भयानक वन को प्राप्त होने में, अत्यंत महान भय में, रोगों के कारण तिरस्कार किये जाने पर भी कुलवान पुरुष अपने मान को नहीं छोडते । मारी के भय से, दुर्भिक्षादि के भय से मदिरा नहीं पीते हैं, मांस नहीं खाते, प्याज1 भक्षण नहीं करते, कुकर्म/खोटे कर्म नहीं करते तथा और भी लज्जाजनक कार्य नहीं करते तो परमार्थ में प्रवर्तते (तपोधन) निंद्यकर्म कैसे करेंगे?

  सदासुखदासजी