
किं पुण कुलगण संघ जस माणिणो लोयपूजिदा साधू ।
माणं पि जहिय काहंति विकम्मं सुजणलज्जणयं॥1543॥
किं िुण कुलगण संघ जस मोणणाि लायििूेजदा साधू ।
माणं ेि जेहय काहंेत ेवकम्मं सुजणलज्जणयं॥1543॥
अन्वयार्थ : जो तपोधन अपने कुल, गण और संघ के यश की कामना करते हैं, जो जगत में पूज्य हैं, ऐसे उत्तम साधु अपने लोक-पूज्य गौरव को छोडकर सज्जन पुरुषों में लज्जाजनक निंद्यकर्म करेंगे? कदापि नहीं करेंगे ।
सदासुखदासजी