मेरुव्व णिप्पकंपा अक्खोभा सागरुव्व गंभीरा ।
धिदिवंतो सप्पुरिसा हुंति महल्लावाईए वि॥1545॥
मेरु समान निकंप, क्षोभ बिन एवं सागर-सम गम्भीर ।
धैर्यशील ही रहें सत्पुरुष चाहे हो विपत्ति महती॥1545॥
अन्वयार्थ : जो महाधैर्य के धारक सत्पुरुष हैं, वे महान विपत्ति आने पर भी मेरु के समान अकंप - अचल रहते हैं और समुद्र के समान क्षोभरहित गंभीर होते हैं ।

  सदासुखदासजी