पं-सदासुखदासजी
केई विमुत्तसंगा आदारोविदभरा अपडिकम्मा ।
गिरि पब्भारमभिगदा बहुसावदसंकडं भीमं॥1546॥
सर्व संग तज आत्मलीन हो करें न रोगों का प्रतिकार ।
हिंसक पशु से भरे भयंकर गिरि के ऊँचे शिखरों पर॥1546॥
सदासुखदासजी