धिदिधणियबद्धकच्छा अणुत्तर विहारिणो सुदसहाया ।
साहिंति उत्तमट्ठं सावददाढंतर गदे वि॥1547॥
धैर्य-कमर कस उत्तम चारितमय श्रुतज्ञान मित्र के साथ ।
सिंहादिक के मुख में जाकर भी जो साधें उत्तम अर्थ॥1547॥
अन्वयार्थ : कितने ही साधु ऐसे हैं कि जिन्होंने समस्त परिग्रह का त्याग कर दिया और आत्मस्वरूप में ही अपने उपयोग को लगा दिया है अर्थात् साधनारत हैं और आई हुई आपत्ति का कुछ भी प्रतीकार/इलाज नहीं करते हैं । अनेक प्रकार के सिंह व्याघ्र, सर्पादि दुष्ट जीवों से व्याप्त और भयानक ऐसे पर्वतों के शिखरों पर अत्यंत धैर्यरूप बाँधी है कमर जिनने तथा सर्वोत्कृष्ट चारित्र में प्रवर्तन करते हैं और श्रुतज्ञान का जिन्हें सहारा है, ऐसे साधु सिंह, व्याघ्रादि दुष्ट जीवों की दाढों के मध्य स्थित होने पर भी अपने उत्तमार्थ रत्नत्रय को साधते हैं, कायर होकर शिथिल नहीं होते ।

  सदासुखदासजी