
भल्लक्किए तिरत्तं खज्जंतो घोर वेदणट्ठोऽवि ।
आराधणं पवण्णोज्झणेणावंति सुकुमालो॥1548॥
उज्जयनी में तीन रात तक मुनि सुकुमाल सियालनी से ।
खाये जाने पर भी ध्यान धार आराधन लीन हुए॥1548॥
अन्वयार्थ : भो क्षपक! देखो, अवंति सुकुमाल नामक मुनि को तीन रात्रि पर्यंत शृगालनी द्वारा खाये जाने पर भी वे आत्मध्यान करके आराधना को प्राप्त हुए थे ।
सदासुखदासजी