
मोग्गिलगिरिम्मि य सुकोशलो वि सिद्धत्थदइय भयवंतो ।
वग्घीण वि खज्जंतो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं॥1549॥
मुदुगल गिरि पर नृप सिद्धार्थ सुपुत्र सुकौशल मुनि भगवान ।
पूर्व जन्म जननी व्याघ्री ने खाया, पर साधा परमार्थ॥1549॥
अन्वयार्थ : सिद्धार्थ राजा के सुकौशल नामक पुत्र ने दीक्षा ली और वे मुद्गल नाम के पर्वत पर स्थित थे । उस वक्त उनकी ही माता का जीव मरकर व्याघ्री हुआ और उस व्याघ्री के द्वारा खाये जाने पर भी उन्होंने उत्तम अर्थ/रत्नत्रय की साधना की अर्थात् अपने स्वरूप में स्थित रहे ।
सदासुखदासजी