
भूमीए समं कीलाकोट्टिददेहो वि अल्लचम्मं व ।
भयवं पि गयकुमारो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं॥1550॥
पृथ्वी पर गीले चमड़े की तरह ठोक दी तन में कील ।
तो भी भगवन गजकुमार मुनि उत्तमार्थ में हुए सुलीन॥1550॥
अन्वयार्थ : पवित्र चारित्र वाले गजकुमार मुनि को पृथ्वी में गीले चमडे के समान कीलें ठोककर जिनका शरीर कीलित कर दिया है, ऐसे होते हुए भी उत्तमार्थ/निर्वाण को प्राप्त किया ।
सदासुखदासजी