
कच्छुजरखाससोसो भत्तेच्छदुच्छिकुच्छिदुक्खाणि ।
अधियासयाणि सम्मं सणक्कुमारेण वाससंद॥1551॥
क्षुधा तृषा ज्वर खाज वमन नेत्र-उदर पीड़ा उदराग्नि ।
के दुःख सनतकुमार मुनि ने धैर्य सहित वषाब भोगे॥1551॥
अन्वयार्थ : भो मुने! देखो, सनत्कुमार चक्रवर्ती/महामुनि ने सौ वर्ष पर्यंत खाज, ज्वर, कास शोष, तीव्र क्षुधा, अग्नि की बाधा तथा वमन, नेत्र-पीडा, उदरपीडा, इत्यादि अनेक रोग जनित दु:खोंे को क्लेशरहित साम्य परिणामों से सहते हुए, अपने धैर्य को नहीं छोडा और रत्नत्रय की साधना करके मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त हुए ।
सदासुखदासजी