ओमोदरिए घोराए भद्दबाहू असंकिलिठ्ठमदी ।
घोराए तिगिंच्छाए पडिवण्णो उत्तमं ठाणं॥1553॥
अवमौदर्य घोर तपधारी भद्रबाहु मुनि क्षुत् पीड़ित ।
संक्लेश परिणाम न करके उत्तमार्थ को प्राप्त हुए॥1553॥
अन्वयार्थ : भद्रबाहु नाम के महामुनि को घोर क्षुधावेदना हुई तो भी संक्लेश रहित परिणामों के अवलंबन से अल्प आहार/अवमौदर्यतप को ही धारण करके उत्तम स्थान को प्राप्त हुए ।

  सदासुखदासजी