
चंपाए मासखमाणं करित्तु गंगातडम्मि तण्हाए ।
घोराए धम्मघोसो पडिवण्णो उत्तमं ठाणे॥1555॥
एक मास उपवास धारकर धर्मघोष नामक मुनिराज ।
गंगा तट पर तीव्र प्यास से पीड़ित, पर पाया परमार्थ॥1555॥
अन्वयार्थ : चंपानगरी के बाह्य गंगा नदी के तट पर धर्मघोष नामक महामुनि एक माह का उपवास धारण करके और घोर तृषा की वेदना से संक्लेश रहित होकर उत्तमार्थ/ आराधनासहित मरण को प्राप्त हुए । तृषा की वेदना होने पर भी जल की इच्छा नहीं की, संयम नहीं बिगाडा, धैर्य धारण करके आत्मकल्याण किया ।
सदासुखदासजी