
सीदेण पुव्ववइरियदेवेण विकुव्विएण घोरेण ।
संतत्तो सिरिदत्तो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं॥1556॥
पूर्व जन्म के बैरी सुर ने ऋद्धि विक्रिया से बहु शीत ।
की उत्पन्न, तथापि मुनि श्रीदत्त हुए प्राप्त परमार्थ॥1556॥
अन्वयार्थ : श्रीदत्त नाम के मुनिराज ध्यान में स्थित थे । उस समय पूर्व जन्म के वैरी देव ने विक्रिया द्वारा शीत वायु चलाकर घोर पीडा दी तो भी श्रीदत्त मुनि ने संक्लेश रहित हो उत्तम स्थान को प्राप्त किया ।
सदासुखदासजी