
उण्हं वादं उण्हं सिलादलं आदवं च अदिउण्हं ।
सहिदूण उसहसेणो पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं॥1557॥
गर्म वायु अरु गर्म शिला अत्यन्त तीव्र उष्ण आताप ।
सहते-सहते वृषभसेन मुनि ने पाया था उत्तम अर्थ॥1557॥
अन्वयार्थ : वृषभसेन नाम के मुनिराज शिला पर ध्यान करते थे, एक दिन गर्मी में उस शिला को किसी ने अग्नि से तपाया, उस अग्निसमान तप्त शिला के ताप, उष्ण पवन और अति उष्ण सूर्य के आताप को संक्लेश रहित होकर सहते हुए उत्तमार्थ को प्राप्त हुए ।
सदासुखदासजी