हत्थिणपुर गुरुदत्तो सम्मलिथाली व दोणिमंतम्मि ।
डज्झंतो अधियासिय पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं॥1561॥
गजपुर वासी गुरुदत्त मुनि आए द्रोणगिरि पर्वत ।
चारों ओर आग से जलकर प्राप्त किया था उत्तम अर्थ॥1561॥
अन्वयार्थ : हस्तिनागपुर में बसने वाले गुरुदत्त नाम के मुनि द्रोणिमति/द्रोणगिरि पर्वत पर ध्यान करते थे । पूर्व भव का सिंह जिसे गुफा में बंद करके जलाया था, वह मरकर उसी नगरी में कपिल नाम का ब्राह्मण हुआ । उसने संभलिथाली नांई1/सेमर की नाम रुई से मुनिराज गुरुदत्त को लपेट दिया और आग लगा दी । अग्नि में दग्ध होने पर भी उन्होंने उत्तमार्थ को साधा/ केवलज्ञान प्राप्त किया ।

  सदासुखदासजी