गोठ्ठे पाओवगदो सुबंधुणा गोच्चरे पलिवदम्मि ।
डज्झंतो चाणक्को पडिवण्णो उत्तमं अट्ठं॥1565॥
गोकुल में प्रायोपगमन संन्यास धारकर मुनि चाणक्य ।
आग लगाई मन्त्री ने, मुनिवर ने पाया उत्तम-अर्थ॥1565॥
अन्वयार्थ : किसी सुबन्धु नाम के वैरी ने गायों के रहने के घर में अग्नि लगाई, गायों के गृह में चाणक्य मुनि ध्यानस्थ थे । अग्नि के कारण वे जल गये, उसी समय उन्होंने प्रायोपगमन संन्यास धारण करके संक्लेशरहित होकर उत्तम अर्थ को साधा । अग्नि में जलते हुए भी समभावों से अंतरंग-बहिरंग सर्व उपाधि त्यागकर आत्मकल्याण किया ।

  सदासुखदासजी