जदिदा एवं एदे अणगारा तिव्ववेदणट्ठा वि ।
एयागी पडियम्मा पडिवण्णा उत्तमं अट्ठं॥1567॥
इस प्रकार ये मुनि अकेले पीड़ित तीव्र वेदना से ।
करें नहीं प्रतिकार किन्तु सब उत्तमार्थ को प्राप्त हुए॥1567॥

  सदासुखदासजी