किं पुण अणयार सहायगेण कीरंतयम्मि पडिकम्मे ।
संघे ओलग्गंते आराधेदुं ण सकेज्ज॥1568॥
किन्तु कष्ट परिहार हेतु है संग तुम्हारे मुनि समुदाय ।
करते हैं उपासना संग में क्यों न कर सको आराधन॥1568॥
अन्वयार्थ : निर्यापकाचार्य संस्तर को प्राप्त क्षपक कहते हैं - भो मुने! देखो! इतने इतने मुनि तीव्र वेदना को प्राप्त जिनके शरीर का प्रतीकार करने वाला कोई नहीं असहाय, अकेले, इलाज, प्रतीकार, वैयावृत्य रहित/ वैयावृत्य करने वाला कोई नहीं तो भी कायरता रहित परम धैर्य धारण करके उत्तम अर्थ को प्राप्त हुए तो भो मुने! तुम तो मुनियों की सहायता युक्त और सर्व संघ के द्वारा इलाज में उपासना कराते हुए हो, तुम आराधना को आराधने में कैसे उद्यमी नहीं होते हो?

  सदासुखदासजी