जिणवयण ममिदभूदं महुरं कण्णाहुदिं सुणंतेण ।
सक्का हु संघमज्जे साहेदुं उत्तमं अट्ठं॥1569॥
कर्ण युगल में नित्य तुम्हारे अमृत जैसे मधुर वचन ।
सुनते हुए संघ के संग में तुमको आराधना सरल॥1569॥
अन्वयार्थ : भो मुने ! समस्त संघ के मध्य रहते हुए तथा कर्णरूपी अंजुलि द्वारा जिनेन्द्र भगवान की मधुर बाणीरूपी अमृत को पीकर मोक्षरूप चार आराधनाओं को सुखपूर्वक आराधने में तुम समर्थ हो ।

  सदासुखदासजी